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Tuesday, January 27, 2015

ग़ज़ल

करायेंगे हमें मुन्सिफ़ प्रतीक्षा कब तक।
हमारे धैर्य की होगी परीक्षा कब तक।

किसी को दण्ड मिले लोकहित हनन के लिए,
हरेक जुर्म की लम्बी समीक्षा कब तक।

बयानबाज़ी बहुत हो ली अब ये बतलाओ,
पड़ेगी सीता को देनी परीक्षा कब तक।

बिना किताब पढ़े ही लिखेगा आलोचक,
मगर बता दे छपेगी समीक्षा कब तक।

हमारी साधना कमज़ोर है न जाने 'नरेश',
टलेगी और अभी अपनी दीक्षा कब तक।

Friday, June 13, 2014

तकल्लुफ़ बरतरफ़




आओ दो इक लम्हे मेरे साथ गुज़ारो
मैं भी तुम जैसा ही बेबस बेचारा हूँ
मेरे दिल में भी यादों का धुआँ भरा है
मेरे दिल में भी हसरत की चिता
न जाने कब से
अब तक सुलग रही है
लेकिन मैं अपने ग़म को
अपने अन्दर ही दफ़न किए हूँ
तुम पर क्या
मैंने अपने पर भी
अपना ग़म ज़ाहिर होने नहीं दिया है।

मैं हँसता हूँ
पहले कोशिश से हस्ता था
अब हँसने की आदत सी है

आओ तुम्हारे दर्द भरे लम्हों को
अपनी इस आदत की तेज़ हवा में
उड़ा-उड़ा कर दूर भगा दूँ

हो सकता है फिर तुम भी
अपने ग़म को अपने सीने में दफ़्नाकर
मेरी तरह हसने लग जाओ। 

Thursday, March 27, 2014

ग़ज़ल

दिल-सी नायाब चीज़ खो बैठे।
कैसी दौलत से हाथ धो बैठे।

अह्दे-माज़ी का ज़िक्र क्या हमदम,
अह्दे-माज़ी को कबके रो बैठे।

हमको अब ग़म नहीं जुदाई का,
अश्के-ग़म जाम में समो बैठे।

वअज़ करने को आए थे वाइज़,
मै से दामन मगर भिगो बैठे।

क्या सबब है 'नरेश' जी आख़िर,
क्यों जुदा आप सब से हो बैठे।

(नायब - दुर्लभ; अह्दे-माज़ी - अतीत; हमदम - मित्र; अश्के-ग़म - ग़म के आँसू; वअज़ - नसीहत; वाइज़ - उपदेशक)